۲۴ مرداد ۱۴۰۱ |۱۷ محرم ۱۴۴۴ | Aug 15, 2022
जय जवान जय किसान

जय जवान जय किसान

जय जवान जय किसान जय जवान 
बरक़रार तुमसे मुल्क की है शान 
और है तुम्हीं से क़ायम आन बान
उठ के देश का बचा लो संविधान
जय जवान जय किसान जय जवान 

उठ के  ज़ुल्म का गु़रूर तोड़ दो
जो हैं बेज़मीर उन्हें झिंझोड़ दो
मुल्क के लिए लहु निचोड़ दो
खु़श्क हो रहा है अपना गुल्सितान
जय जवान जय किसान जय जवान
 
अज़्म से उलट दो बढ़ के इक़तेदार 
रौंद डालो तुम सितम के कोहसार 
चाहे सामने हो मुश्किलें हज़ार 
वक़्त ले रहा है अपना इमतेहान
जय जवान जय किसान जय जवान 

जा़लिमों का उठके कर दो बेड़ा ग़र्क़
ऊँच नींच के मिटा दो सारे फ़र्क़ 
फाड़ डालो तुम क़बाए ज़र्क़ बर्क़ 
जु़ल्म को ना मिल सके कहीं अमान 
जय जवान जय किसान जय जवान
 
तुम ही तो स्वतंत्रता का ख़्वाब हो
हर सवाले जु़ल्म का जवाब हो
मुल्क के चमन के तुम गुलाब हो
और तुमही हो इस चमन के बाग़बान 
जय जवान जय किसान जय जवान
 
तोड़ डालो उठ के जु़ल्म का फ़ुसूँ
उन उठे सरों को करदो सरनिगूँ
बह रहा है देखो मुफ़लिसों का खूँ
अपना भारत आज है लहूलहान
जय जवान जय किसान जय जवान 

हों वह सिख कि हिंदू और क्रिश्चियन 
मुस्लिम और दलित हों कि हों ब्रहमन 
अपने हिंद की यही है अंजुमन
और हैं यही हमारा ख़ानदान 
जय जवान जय किसान जय जवान 

कम हो वल्वला न जोश सर्द हो
ख़ौफे़ ज़ुल्म से न चेहरा ज़र्द हो
तुमने यह जता दिया कि मर्द हो
लक्ष्य पर रहे सदा तुम्हारा ध्यान
जय जवान जय किसान जय जवान 

ख़ौफ़ हमको क्यों हो जुल्मो जौर से 
है मुक़ाबला ख़राब दौर से 
देखता हिमालया है गौ़र से 
रहमते ख़ुदा है हम पे मेहरबान
जय जवान जय किसान जय जवान 

गरचे तुम हो मुफलिस और तंगदस्त 
हौसले तुम्हारे हों कभी न पस्त 
देदो सारे तानाशाहों को शिकस्त
फिर कहीं न हो सके विराजमान 
जय जवान जय किसान जय जवान 

सर से बाँधकर कफन निकल पड़ो
वक़्त कह रहा है अब कि चल पड़ो
गर्म ख़ून की तरह उबल पड़ो
मुल्क मागंता है तुमसे रक्तदान
जय जवान जय किसान जय जवान

कवि:मिन्हाल आज़मी

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