۳۱ اردیبهشت ۱۴۰۱ |۱۹ شوال ۱۴۴۳ | May 21, 2022
حجت الاسلام سید حسن موسوی - رئیس انجمن شیعیان جامو وکشمیر

हौज़ा / जम्मू-कश्मीर की अंजुमने शरअई के अध्यक्ष ने कहा कि आइम्मा-ए- मासूमीन (अ.स.) की दिल को रुला देने वाली शहादते धार्मिक मामलो में वक्त के शासकों की बुराई और कुरआन और सुन्नत से विरोधक नीतियों की विशेषता है। क्योंकि आईम्मा-ए- मासूमीन (अ.स.) कुरआन और सुन्नत के सच्चे संरक्षक और उत्तराधिकारी होने के नाते, शासकों की इस्लामी विरोधी नीतियों पर चुप नहीं रह सकते .

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, बडगाम/ सिलसिल-ए- इमामत की सातवीं कड़ी, हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) की शहादत के दिन, जम्मू-कश्मीर की अंजुमने शरअई द्वारा एक शोक समारोह का आयोजन सेंट्रल इमाम बाड़ा बडगाम में किया गया, जहां घाटी के आतराफ से हजारों की संख्या में अकीदत मन्दो ने शोक समारोह मे भाग लेते हुए वक्त के इमाम ज़माना (अ.त.फ़.श.) को खिराज पेश किया।
इस अवसर पर अंजुमने शरअई  के अध्यक्ष, हुज्जतुल इस्लाम मौलाना आग़ा सैय्यद हसन मूसवी सफ़वी ने शोक समारोह को संबोधित करते हुए, हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) की जीवनी और चरित्र के विभिन्न पहलुओं को समझाया। और मौलाना ने बताया इस्लामिक साम्राज्य का क्षेत्रफल (दायरा) बहुत अधिक बढ़ गया था, लेकिन पैगंबर के परिवार के सबसे सम्मानित और विद्वान के रूप में इस्लामिक खिलाफत पूरी तरह से एक राजशाही में तब्दील हो गयी। और पैगंबर के ज्ञान के उत्तराधिकारी, उस समय के शासकों ने सर्वोच्च व्यक्तित्व को उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा माना था। उन्हें जेल में शहीद किया गया।

बयान को जारी रखते हुए आगे कहा:कि अक्सर इमामों की शहादते दिल को रुला देने वाली अधिकांश सहानु भूतिपूर्ण प्रमाण. कुरआन और सुन्नत के विपरीत धार्मिक मामलों और नीतियों में उस समय के शासकों के बुरे हस्तक्षेप का परिणाम हैं क्योंकि इमाम कुरान के वास्तविक रक्षक और उत्तराधिकारी हैं।

इस अवसर पर, आग़ा साहिब ने सामाजिक बुराइयों की जानकारी देते हुए, लोगों से आग्रह किया कि वे इस खतरे से समाज को छुटकारा दिलाने के लिए आगे आए।

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