۲۹ اردیبهشت ۱۴۰۱ |۱۷ شوال ۱۴۴۳ | May 19, 2022
امام خامنه ای

हौज़ा/रहबरे मोअज़्ज़म इमाम सैय्यद अली ख़ामेनई (द) ने यौमे नौरोज़ की मुनासिबत से पिछले रोज़ की दोपहर 21/3/2021; को मिल्लते ईरान और उम्मते इस्लामिया से आलमी ख़िताब फ़रमाया है।इस ख़िताब के अहम नुकात कुछ यूं हैं:

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार,रहबरे मोअज़्ज़म इमाम सैय्यद अली ख़ामेनई (द) ने यौमे नौरोज़ की मुनासिबत से पिछले रोज़ की दोपहर 21/3/2021; को मिल्लते ईरान और उम्मते इस्लामिया से आलमी ख़िताब फ़रमाया है।इस ख़िताब के अहम नुकात कुछ यूं हैं:

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने फ़रमाया है की, 'यमन की जंग ओबामा की डेमोक्रेटिक हुकूमत के ज़माने में सऊदी अरब ने शुरू की और अमरीका के ग्रीन सिग्नल पर की थी। अमरीका ने इन्हें इजाज़त दी और इनकी मदद की, बेशुमार फ़ौजी वसाएल इनके हवाले किए, किसलिए? इसलिए की यमन के निहत्थे आवाम पर इतने बम बरसाएं कि 15 दिनों में या 1 महीने में वो इनके सामने झुक जाएं, ऐसा नहीं हुआ, उन्होंने ग़लती की।'

आप ने फ़रमाया है की, 'आज 6 साल हो चुके हैं और वो ऐसा नहीं करवा सकें। मार्च के यही अय्याम थे की यमन पर हमला शुरू हुआ था। इस दिन से 6 साल गुज़र चुके हैं और ये लोग यमन की आवाम को झुका नहीं सकते। अमरीकीयों से मेरा सवाल; है कि जिस दिन तुमने सऊदी को यमन की जंग शुरू करने का ग्रीन सिग्नल दिया था, क्या तुम्हें मालूम था की अंजाम क्या होगा?'

आपने अमरीकियों को मुख़ातिब करते हुए कहा है कि: 'तुम जानते थे, की सऊदी अरब को किस दलदल में फंसा रहे हो? कि अब वो ना तो उसमें बाक़ी रह सकता है और ना ही बाहर निकल सकता है। इसलिए इसे दो तरफ़ा मुश्किलात हैं, ना तो वो जंग को रोक सकता है और ना ही उसे जारी रख सकता है। इसलिए दोनों सूरतों में सऊदी का नुकसान है, तुमने सऊदियों को फंसा दिया है।

आपका कहना था की, 'तुम अमरीकी जानते थे की सऊदी अरब को किस मुसीबत में धकेल रहे हो, अगर जानते थे और फ़िर भी तुमने ऐसा किया है तो; इसमें तुम्हारे साथियों की बदनसीबी है की तुम इनके बारे में इस तरह के अमल करते हो, अगर इन्हें नहीं जानते थे, तब भी तुम्हारे साथियों पर वाय हो!; जो तुम पर यक़ीन करते हैं और अपने प्रोग्रामों को तुम्हारे हिसाब से तैयार करते हैं, जबकि तुम इलाक़े के हालात से ना-वाक़िफ़ हो।

आपने कहा है की इलाक़े के तमाम मसाएल के बारे में अमरीकी ग़लतफ़हमी का शिकार है। ये इस वक़्त भी ग़लती कर रहे हैं। ये सह्युनी (इस्राइली) हुकूमत की जो ज़ालिमाना हिमायत कर रहे हैं, ग़लत है। ये शाम में ग़ासीबाना तरीक़े से दाख़िल हो गए हैं। फ़रात के शर्क पर वसी: पैमाने पर मौजूद है। ये बात यक़ीनी तौर पर ग़लत है और यमन के मज़लूम आवाम के सरकुबी में सऊदी अरब की हुकूमत का साथ देना भी ग़लत है।

आपने इस बात पर ताकीद करते हुए की फ़िलिस्तीन के बारे में अमरीका की पॉलिसियां ग़लत है, कहा है की, 'आलमे इस्लाम में फ़िलिस्तीन का मसला कभी भी फ़रामोश नहीं होगा। ये [दुश्मन] इसी बात पर ख़ुश हैं की 2,4 हक़ीर हुकूमतें [बहरीन, एमारात, वग़ैरह] सह्यूनी हुकूमत से राब्ता क़ायम कर लें और ताल्लुक़ात को मामुल पर ले आएं। इनका कोई असर ही नहीं है, दो-तीन ग़ैर मोअस्सिर हुकुमतों की वजह से फ़िलिस्तीन का मसला भुलाया नहीं जा सकता है और उम्मते मुस्लिमा मसला-ए-फ़िलिस्तीन को नज़रअंदाज़ नहीं करेगी, इसे अमरीका जान ले। यमन का मामला भी ऐसा है।'

तक़रीर के दूसरे हिस्से में आपने अमरीका की शदीद तरीन दबाव की हार की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया है कि, 'इन जैसे निचले दर्जे के अहमक़ो ने शदीद तरीन दबाव की पॉलिसी को इसलिए तैयार और नाफ़िज़ किया था कि ईरान को कमज़ोर पोज़िशन में लेकर आए और फ़िर ईरान कमज़ोरी के सबब मुज़ाकिरात की मेज़ पर आने के लिए मजबूर हो जाए और फ़िर वो अपने मुतालेबात को ईरान पर मुसल्लत कर दें। वो (ट्रंप) तो दफ़ा हो गया और वो भी कितनी बेइज़्ज़ती के साथ दफ़ा हुआ है। इसका जाना भी इज़्ज़त के साथ नहीं था, बल्कि ज़िल्लत और रुसवाई के साथ था। वो ख़ुद भी ज़लील हुआ और अपने मुल्क को भी ज़लील करवा गया। ईरान पर दबाव अब तक तो नाकाम ही रहा है और अमरीकी इसके बाद भी बेइज़्ज़ती का सामना करेंगे, ये लोग भी दफ़ा हो जाएंगे और इस्लामी जम्हुरिया-ए-ईरान, पूरी ताक़त और सरबुलंदी के साथ बाक़ी रहेगा।

आपने एटॉमिक मुहाएदे के बारे में कहा है कि, 'एटॉमिक मुहाएदे के फ़रीक़ो के साथ तअव्वुन के बारे में हमारे मुल्क के मौक़िफ़ का ऐलान किया जा चुका है। हमें इस ऐलान से बिल्कुल भी हटना नहीं चाहिए। हमारा मौक़िफ़ ये है की अमरीका सारी पाबंदियों को ख़त्म करें, फ़िर हम इनकी सच्चाई को परखेंगे। अगर सही माअनी में पाबंदियां हट गईं होंगी, तो फ़िर हम एटॉमिक मुहाएदे में अपनी ज़िम्मेदारियों की तरफ़ लौट आएंगे। ये हमारा हत्मी मौक़िफ़ है।'

आपने कहा है कि, 'कुछ अमरीकी, इस न्यूक्लियर डील के सिलसिले में भी कुछ बातें कर रहे हैं, मैंने सुना है कि कुछ अमरीकी कह रहे हैं की, आज के हालात सन् 2015 और 2016 के हालात से काफ़ी बदल चुके हैं, जब न्यूक्लियर डील पर साइन हुए थे। इसलिए न्यूक्लियर डील में भी बदलाव लाना चाहिए। मैं भी इस बात को तस्लीम करता हूं की, आज के हालात सन् 2015 और 2016 से बिल्कुल बदल चुकें है। लेकिन अमरीकियों के हक़ में नहीं बदले हैं, बल्कि हमारे हक़ में बदले हैं। 2015 का ईरान; आज ज़्यादा ताक़तवर हो चुका है, ये अपने पैरों पर खड़े होने में कामयाब हुआ है, इसने ख़ुद एटॉमिक क़ुव्वत हासिल कर ली है। अमरीकी; 2015 से अब तक सिर्फ़ बेइज़्ज़त हुए है।'

आपने फ़रमाया है कि, 'अमरीका में कैसी हुकूमत आई थी, जिसने अपनी बातों, अमल और रवैय्ये से और फ़िर इक़्तेदार से हटने के तरीक़े से तुम्हें रुसवा किया। माअशी मुश्किलात ने तुम्हारे, पूरे मुल्क को अपने चंगुल में जकड़ लिया है। हां! हालात बदले हैं, लेकिन तुम्हारे नुकसान में और अगर न्यूक्लियर डील में तब्दीली होनी है, तो उसे अमरीका के नहीं बल्कि ईरान की मर्ज़ी के मुताबिक़ होना चाहिए।

आपने ऑनलाइन तक़रीर के आख़िर में कहा है कि, 'जो हम कहते हैं वो पहले पाबंदियां हटाएं, तो मैंने सुना है की दुनिया के कुछ सियासतदान कहते हैं, की जनाब — पहले आप! इसमें क्या फ़र्क़ पड़ता है? अमरीका कह रहा है की, पहले आप देखिए। बात पहले मैं, पहले आपकी नहीं है, बात ये है कि हमने ओबामा के ज़माने में अमरीकियों की बात पर यक़ीन किया था और जो काम हमें करने चाहिए थे, वो हमने किए भी थे। न्यूक्लियर डील की बुनियाद पर की गई बातों पर इन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा नहीं किया है यानी सिर्फ़ काग़ज़ पर कहा की, 'पाबंदियां उठा ली गईं है।'

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