۱۶ تیر ۱۴۰۱ |۷ ذیحجهٔ ۱۴۴۳ | Jul 7, 2022
मौलाना मेराज खान

हौज़ा / हर बंदे मोमिन को हर हाल मे अपने इमाम से जुड़ा रहना चाहिए, इमाम ज़मान (अ.त.फ.श.) के साथ संचार के साधन हैं, लेकिन अस्रे गैबत मे सबसे महत्वपूर्ण साधन 'दुआ-ए अहद ' है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, चेन्नई / हज़रत इमाम हुज्जत बिन अल हसन अल असकरी का जन्म तमिलनाडु राज्य में, विशेषकर चेन्नई शहर में, विभिन्न मस्जिदों और इमाम बरगाहों में पूरी निष्ठा के साथ मनाया गया। जिसमे कवियों और विद्वानों ने इमाम की खिदमत मे नजराना ए अक़ीदत पेश किया।

इस बीच, मौलाना मोहम्मद मेराज रान्नवी ने अपने नमाज़े जुमा के खुतबे में इमाम अस्र (अ.त.फ.श.)  जीवन पर प्रकाश डाला और नमाज़े जुमा के बाद विश्वासियों के लिए किलास मे दुआ ए अहद पर चर्चा की, जो बहुत उपयोगी थी।

उन्होंने कहा कि हर बंदे मोमिन को हर हाल मे अपने इमाम से जुड़ा रहना चाहिए, इमाम ज़मान (अ.त.फ.श.) के साथ संचार के साधन हैं, लेकिन अस्रे गैबत मे सबसे महत्वपूर्ण साधन 'दुआ-ए अहद ' है। यह दुआ पैगंबर (स.अ.व.व.) के छठे उत्तराधिकारी इमामे जाफर सादिक (अ.स.) से नक़ल हुई है जिसे फ़जर की नमाज के बाद और सूर्योदय से पहले पाठ का समय निर्धारित किया गया है। इस दुआ को पढ़ने के बहुत से लाभ है जिन मे इमाम सादिक (अ.स.) के अनुसार इसे पढ़ने वाला इमाम ज़मान को दरक करेगा। यहां तक ​​कि अगर वह मर जाएगा तो इमाम (अ.त.फ.श.) के जहूर के समय फिर से जीवित हो जाएगा।

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