۶ تیر ۱۴۰۱ |۲۷ ذیقعدهٔ ۱۴۴۳ | Jun 27, 2022
मौलाना रज़ी

हौज़ा / हज़रत मासूमा क़ुम वह महिला है जिसकी कृपा का स्रोत चिरस्थायी है, जिन पर खुदा वंदे आलम, पवित्र पैगंबर, इमाम, औलिया ए इलाही,  स्वर्ग और पृथ्वी के निवासी दुरूद व सलाम भेजते हैं।

लेखक : मौलाना सैयद रज़ी जैदी फंदेड़वी दिल्ली

हौजा न्यूज़ ! मुल्क और मलाकुत की महान खातून जो एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ी जहां माता-पिता और भाई-बहन सब के सब अखलाकी फजिलातो की मैराज पर हैं और इस परिवार के सभी सदस्य ज़ोहोद, तकवा, इबादत, ईमानदारी, साहस, दया और कठिनाइयों मैं ज्ञान, हिल्म, सखावत, इफ्फत, पाकदामनी, तस्बीह, तहलील, जिक्र और खुदा की निशानी है। जिस फैमिली के सब अफराद बरगुज़ीदा और हिदायत के रेहबर, इमामत के दरखशान गोहर और बशरियत के हादी हो ओर खुद जिस का मर्तबा आलमे मुलक मैं दरखशान गोहर की तरह ताबनाक हो ऐसी खातून के बारे में कुछ कहना या लिखना  सूरज को दीया दिखाने की तरह से है। हज़रत मासूमा ए क़ुम वह खातून है जिनका सरचशमा फैज हमेशा जरी व सारी है जिन पर खुदा, अंबिया आयम्मा ओलिया इलाही और जमीन वा आसमान के रहने वाले दुरूद वा सलाम भेजते है।

संक्षेप में, इस महान महिला के बारे में क्या लिखा जा सकता है जिससे लोगों को ज्ञान का खजाना मिल रहा है दुनिया भर के प्यासे विद्वान आशियाना मोहम्मद वा आले-मुहम्मद के पास अपनी प्यास बुझाने और पूरी तरह से सेरब होने के लिए जाते हैं। हजरत के ज्ञान से फैजियाब होते है। घर से दूरियों से जब उसका हृदय भयभीत हो जाता है और उसे विदेश में अपनी माँ की याद आती है, वह अपना घर छोड़कर आप के हरम में हाजिर हो जाते है और इस स्वर्गीय छत्र छाया में बैठने से यह मालूम हो जाता है,और साथ मैं ऐसा लगता है हरम से प्रेम की समुंदरी धाराएँ फूट रही हो। घबराहट और उदासी खत्म होने के साथ साथ वह अपने परिवार से दूरी की भावना गायब हो जाती है। जब किसी को कठिनाई का सामना होता है, तो वह चुपचाप करीमे अहलेबैत की जरीह को पकड़ लेता और अपनी मुश्किल को बयान करता है तो कुछ ही समय मैं मुश्किल खत्म हो जाता है। बहुत सारे  छात्र ने ऐसी बहुत सारी दास्तान सुनाया है और कहा कि मुझे किसी चीज की हाजत थी तो मैं हराम में आया और दुआ की और मुझे जितना चाहिए था कुछ समय बाद उतना मिल गया। जाहिर सी बात है जिस बीबी के हरम मैं हाजरी के बाद मां जैसी ममता का एहसास आता हो , तो वह अपने चाहने वालो को परेशान कैसे देख सकती है? वास्तव में, कुम में छात्रों, विद्वानों का अस्तित्व केवल करीमे अहलेबैत की कृपा से है। एक बार का वाक्या हैं की ईरान की पुलिस गैर अकामत छात्र को बाहर कर रही थी तो किसी ने , अयातुल्ला मुफ्ती सैयद तैयब जज़ायरी मूसवी साहिब नूरुल्ला मरकदाह को दर्दे दिल बयान किया तो उस दरगाह की ओर इशारा किया और कहा: जब तक यह बीबी संतुष्ट है, कोई भी इस शहर और देश से बाहर नहीं निकाल सकता है और आप लोगो का मेजबान करीमा ए अहलेबैत सातवें इमाम बाबुल-हवाईज हजरत मूसा बिन जफर (अ.स.) की बेटी कर रही है तो परेशानी की कोई बात नही है।

हज़रत मासूमा क एल्मी और अखलाकी मुकाम और उनके नाम और उपाधियाँ: ताहिरा, पाक और पाकीज़ा, हमीदा, जिसकी सताएश और तारीफ हुई है, बीरराह नेकुकार , रशीदा, हेदायत यफ्ता आकेला, परहेजगार, राजिया, खुदा से राजी,मर्जिया, उनसे खुदा राजी और खोशनूद है। हजरत मासूमा भिब सनी जेहरा हज़रत जैनब की तरह  आलेमा और गैर मोअलेमा है( ऐसे आलिमा के जिनका कोई उस्ताद नही) हज़रत मासूम इलम तकवा और अखलाकी फजाय का सर चश्मा है।

आप इन विशेषताओं के स्रोत क्यों नहीं हैं जब इमाम अली इब्न मूसा अल-रजा (अ) ने इमाम हफ्तम (अ) की शहादत के बाद आपकी और अन्य बहनों और भाइयों की रक्षा और शिक्षित करने की जिम्मेदारी संभाली। इमाम रज़ा (अ) के विशेष ध्यान के कारण, इमाम मूसा काज़िम (अ) के सभी पुत्रों ने उच्च बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया और अपने ज्ञान और ज्ञान के कारण प्रसिद्ध हो गए।

हज़रतमासूमा क़ुम की मंजिलत का अनुमान इस रिवायत से लगाया जा सकता है: एक दिन अहल अल-बैत (अ) के शियाओं का एक ग्रुप इमाम मूसा काजिम (अ.)से मिलने मदीना पहुँचा और ये लोग भी आपसे कुछ सवाल पूछना चाहते थे। हज़रत के घर से, आपकी नन्ही बेटी (हज़रत मासूमा, ने उन से उनका सवाल मांगा और एक कागज मैं जवाब लिख कर उनके पास भेज दिए। जब ​​उन्होंने अपने सवालों के जवाब देखे, तो वे बहुत खुश हुए और मदीना से अपने घर वापिस जाने लगे इत्तेफाक से रास्ते मैं इमाम मूसा काज़िम (अ) से मुलाकात और उन्हें अपनी  अपनी पूरी कहानी सुनाई। इमाम (एएस) ने सवालों और जवाबों को पढ़ा और फरमाया : फ़िदा अबूहा, फ़िदा अबूहा, फ़िदाहा अबूहा, यह बाप उस पर फिदा हो।

आपके वजूद की बरकत से अल्लाह ने क़ुम को पवित्र कर दिया और अहल अल-बैत (अ) ने इसे अपना हरम क़रार दिया है। इमाम सादिक (अ) फरमाते हैं: खबर दार हो जाओ की मेरा हरम और मेरे बाद आने वाले रेहबारो का हरम क़ुम भाई है। (बिहार अल-अनवार, जिल्द 60, पेज 216) इमाम सादिक (अस) ने रय के लोगों को संबोधित करते हुए फरमाया: अमीर अल-मुमिनिन हज़रत अली के लिए कूफा एक हरम है जान लो कि क़ुम हमारा छोटा कुफ़ा है जान लो जन्नत के आठ द्वार हैं जिनमें से तीन द्वार क़ुम की ओर खुलते हैं।

अंत में, अपने छोटे करयीन की सेवा में, मैं हजरत की जन्म और शहादत की तारीखों को उनके माता-पिता के नाम के साथ लिख रहा हूं, मुझे आशा है कि यह याद रखने में मदद करेगा। हज़रत मासूमा का जन्म मदीना मुनव्वारा की सरजमीन पर 1 जिलकाएदा 173/ हिजरी में हुआ था और इस 28 साल की छोटी सी मुद्दत में वह दस या बारह 201 हिजरी मैं शहर क़ुम मैं  शहीद हो गई। आप के वालिद मूसा काज़िम (अस) और उनकी मां महज़रत नजमा खातून हैं। अपने पिता की शहादत के बाद, उनके भाई हज़रत इमाम अली रज़ा (अ) ने आप को शिक्षा और सही मार्ग देखाने का जिम्मेदारी संभाली। इस शुभ अवसर पर, मैं सभी दोस्ताने अहलेबैत की खिदमत में हज़रत फातिमा मासूमा क़ुम के जन्म की बधाई देता हूं और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि इस अज़ीम शख्सियत के सदके मैं मोमेनिन, की जान माल और गरिमा की रक्षा कर। और क़ुम, नजफ़ और ...  मैं जो इलम की तलाश मैं है सिरवत के साथ-साथ माला माल कर। साथ मैं इस दुनिया से कोरोना जैसी घातक बीमारी को समाप्त कर और  हमारे भारत देश को विकास और तरक्की अता फरमा। और लास्ट मैं हज़रत मेहदी के ज़हूर मैं जल्दी फरमा। आमीन

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