۶ تیر ۱۴۰۱ |۲۷ ذیقعدهٔ ۱۴۴۳ | Jun 27, 2022
مولانا

हौज़ा/ अगर किसी में तब्दीली नहीं तो उसने मोहर्रम को फिक्र और किरदार की तब्दीली नहीं बल्कि रस्मो रिवाज समझकर गुज़ारा है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , लाहौर अली जामा मस्जिद जामियातुल मुन्तज़र जुमआ का खुत्बा देते हुए मौलाना सैय्यद तत्हीर हुसैन जै़दी ने कहा मोहर्रम को याद मनाना रस्म नहीं बल्कि एक संस्कार का हिस्सा है।

यह बात सभी मुसलमानों को याद रखनी चाहिए।रमजान की इबादत भी इसी मुहर्रम की वजह से होती है। अगर कर्बला वाले मोहर्रम में कुर्बानी ना देते तो दूसरे महीनों की इबादत की बारी ही नहीं आती।

मौलाना ने कहा मोहर्रम अपने खुद अपने आप में अहमियत वाला महीना है, हर आदमी पर ज़रूरी है पहली मोहर्रम से लेकर आखरी मोहर्रम तक अजादारी करें और अपने अंदर अपने किरदार के अंदर चेंजिंग लाए और अपने आप को हुसैनी किरदार में डाले, इसको रस्मो रिवाज समझकर अदा ना करें।

बल्कि इससे कुछ हासिल करें औरतों को चाहिए कम से कम इस महीने में पर्दे का खास ख्याल रखें और बीवी की अहमियत और अपने को ज़ैनबी किरदार में डालें।

मौलाना का कहना था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने कियाम और जिहाद का मकसद उम्मते मोहम्मदी की इसलाह था, इसला हमेशा के लिए मतलुब हैं। हर आदमी को अपनी इस्लाह करनी होगी तब कर्बला से दावा दुरुस्त होगा।

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